Opinion generic medicine is cheaper than doctors brand medicine prescription

भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और इलाज पर होने वाले खर्च की तस्वीर किसी से छिपी नहीं है। यहां गरीब आदमी या उसका परिवार इसलिए इलाज नहीं करा पाता कि उस पर होने वाला खर्च वहन करना उसके बूते से बाहर है। यहां अस्पताल का खर्च और डॉक्टर की फीस के साथ ही दवाओं की कीमत भी बहुत ज्यादा होती है। डॉक्टर जो दवाएं लेने की सलाह देते हैं वे किसी खास कंपनी की होती हैं और उनकी कीमत भी बहुत ज्यादा रहती है। इनके मुकाबले जेनेरिक दवाएं सस्ती और बेहतर विकल्प हैं जो असर की कसौटी पर बिल्कुल महंगी दवाओं के सामान होती हैं।

बिल्कुल समान रासायनिक सम्मिश्रण होने के बावजूद इनके निर्माण पर बहुत कम खर्च आता है और इनके प्रसार के लिए बेहिसाब पैसा भी नहीं बहाया जाता। इसलिए इनकी कीमत कम होती है जबकि कथित ब्रांडेड दवाओं के विज्ञापन से लेकर डॉक्टर आदि को प्रभावित करने तक पर इतना पैसा खर्च किया जाता है कि कंपनियां उन दवाओं की कीमत कई बार लागत के मुकाबले कई सौ प्रतिशत ज्यादा रखती हैं। इसके बावजूद लोग जेनेरिक दवाओं की ओर रुख इसलिए भी नहीं करते हैं कि या तो उन्हें इनके बारे में जानकारी नहीं होती या फिर डॉक्टर उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऐसा करने से रोकते हैं।

एक बड़ा कारण यह भी है कि जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता की जगहें बहुत कम हैं और अगर कहीं हैं भी तो उनके बारे में ज्यादातर जरूरतमंद लोगों को जानकारी नहीं होती है। इस मसले पर काफी समय से सरकार की ओर से कोशिशें हो रही हैं कि अस्पतालों से लेकर आम पहुंच वाली जगहों पर जेनेरिक दवा केंद्रों का प्रसार किया जाए ताकि महंगे चिकित्सा खर्च से लोगों को कुछ राहत मिल सके। हालांकि वर्तमान सरकार ने प्रथम प्रयास में 534 जेनेरिक स्टोर खोले थे और भविष्य का लक्ष्य 3000 रखा था। कम कीमत पर गुणवत्तायुक्त जेनेरिक दवाएं मुहैया कराने के मकसद से प्रधानमंत्री जन औषधि योजना की शुरुआत भी की गई है। लेकिन सच यह है कि कम कीमत पर समान गुणवत्ता और असर वाली दवाओं तक जन-सामान्य और खासतौर गरीब तबकों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिहाज से अब तक जितना कुछ किया गया है वह नाकाफी है। ऐसा तब है जबकि नामी कंपनियों की दवाओं के बराबर गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं आम लोगों तक पहुंचाने के मसले पर पिछले कई सालों चर्चा चल रही है।

देश में दवाओं की कीमत की वजह से किसी बीमारी का सही इलाज न करा पाने वाले लोगों की तादाद बढ़ी है तो निश्चित रूप से यह व्यवस्था की इच्छाशक्ति में कमी का नतीजा है। गौरतलब यह भी है कि भारत जेनेरिक दवाओं का उत्पादन करने वाले देशों में प्रमुख है, जो अमेरिका जैसे विकसित देशों समेत विभिन्न मुल्कों को भी दवाओं की आपूर्ति कर रहा है। सवाल है कि अपने जरूरतमंद नागरिकों तक इनकी पहुंच क्यों नहीं तय की जा सकी है!
‘पंकज चौरसिया, वर्धा विश्वविद्यालय, महाराष्ट्र